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भगत सिंह के नाम फैलाया जा रहा झूठ – देखें विडियो !

भगत सिंह के नाम फैलाया जा रहा झूठ | Bhagat Singh Was Not Hanged on 14th Feb

भारत में वैलेंटाइन पर्व का विरोध होता है की ये पश्चिमी सभ्यता या रिश्तों के बाज़ारीकरण का प्रतीक है, कुछ हद्द तक सही भी है, पर उससे बड़ा भ्र्म ये फैलाया जा रहा है की अमर शहीद सरदार भगत सिंह को फांसी 14 फरवरी को दी गयी थी, जो की बिलकुल झूठ है ! भारत में लोगों को शर्म आनी चाहिए जिनको अपने देश के शहीद लोगों के शहीदी दिवस तक के बारे में मालूम नहीं !

भगतसिंह एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जो राष्ट्रवादी और देशभक्त परिवार था. वे किसी वणिक या तानाशाह के परिवार में पैदा नहीं हुए थे. मनुष्य के विकास में उसके परिवार, मां बाप की परवरिश, चाचा और औरों की भूमिका होती है. भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह एक विचारक थे, लेखक थे, देशभक्त नागरिक थे. उनके पिता खुद एक बड़े देशभक्त नागरिक थे. उनका भगतसिंह के जीवन पर असर पड़ा. लाला छबीलदास जैसे पुस्तकालय के प्रभारी से मिली किताबें भगतसिंह ने दीमक की तरह चाटीं. वे कहते हैं कि भगतसिंह किताबों को पढ़ता नहीं था.

फाँसी की सज़ा

23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु देशभक्ति को अपराध कहकर फाँसी पर लटका दिए गए। यह भी माना जाता है कि मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन जन रोष से डरी सरकार ने 23-24 मार्च की मध्यरात्रि ही इन वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया। ‘लाहौर षड़यंत्र’ के मुक़दमे में भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा मिली तथा 23 वर्ष 5 माह और 23 दिन की आयु में ही, 23 मार्च 1931 की रात में उन्होंने हँसते-हँसते संसार से विदा ले ली।

Bhagat Singh Death Certificate

भगतसिंह के उदय से न केवल अपने देश के स्वतंत्रता संघर्ष को गति मिली वरन् नवयुवकों के लिए भी प्रेरणा स्रोत सिद्ध हुआ। वे देश के समस्त शहीदों के सिरमौर थे। 24 मार्च को यह समाचार जब देशवासियों को मिला तो लोग वहाँ पहुँचे, जहाँ इन शहीदों की पवित्र राख और कुछ अस्थियाँ पड़ी थीं। देश के दीवाने उस राख को ही सिर पर लगाए उन अस्थियों को संभाले अंग्रेज़ी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने लगे। देश और विदेश के प्रमुख नेताओं और पत्रों ने अंग्रेज़ी सरकार के इस काले कारनामे की तीव्र निंदा की।

Gandhi Didn't Oppose Bhagat Singh Hanging

गाँधी चाहते तो…. फांसी न चढ़ते भगत सिंह

हैरीनी की बात ये है की देश के लिए बड़े बड़े सत्यग्रह करने वाले तथाकथित महात्मा बापू गाँधी और नेहरू जो के दोनों पेशे सी वकील थे इन दोनों ने भगत सिंह और साथियों की फांसी के खिलाफ न तो कोई आवाज़ उठाई ने ही कोई सत्याग्रह या आंदोलन किया. गाँधी और नेहरू दोनों का शहीद सरदार भगत सिंह की फांसी का विरोध न करना डीनो की मक्कारी को दर्शाता है, गाँधी को देश का बापू बनना था और नेहरू को प्रधानमंत्री, तो भगत सिंह और सुभष चन्द्र बोस जैसे सच्चे क्रन्तिकारी इन दोनों के खवाबों ने रोडे थे जिनको इन्होंने ने बड़ी चालाकी सी स्वयम रास्ते सी हटने दिया !

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