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BREAKING NEWS : पूर्व कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुई भर्तियों की विजिलेंस की प्रारम्भिक जांच में धांधलियां पाई गई हैं,अब कई रसूखदार लोग जांच की जद मे

जयराम सरकार में कोई घोटालेबाज नहीं बचेगा अब ये बात तो तय है। सत्ता में आये अभी जयराम सरकार को दो साल भी पुरे नहीं हुए हैं सरकार ने कांग्रेस राज में हुए घोटालों की पोल खोलना शुरू कर दिया है। केसीसी बैंक में कांग्रेस के समय हुई भर्तियों में जमकर हुई थी धांधलियाँ। कई बड़े चेहरे जाँच के घेरे में आ चुके हैं। कांगड़ा केंद्रीय सहकारी (केसीसी) बैंक में पूर्व कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुई भर्तियों की विजिलेंस की प्रारंभिक जांच में धांधलियां पाई गई हैं। अब कई रसूखदार लोग जांच की जद में आएंगे। सूत्रों के अनुसार विजिलेंस ने एफआइआर दर्ज करने की तैयारी कर ली है।

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एफआइआर कभी भी दर्ज हो सकती है। मंजूरी लेने के लिए फाइल राज्य सचिवालय के गृह विभाग के आला अधिकारियों के पास पहुंच गई है। जैसे ही स्वीकृति मिलेगी, विजिलेंस कानूनी कार्रवाई करेगी। इसे जांच के लिए स्पेशल इंवेस्टीगेशन यूनिट को सौंपा जा सकता है। हालांकि क्षेत्राधिकार कांगड़ा है। बैंक का प्रबंधन वहीं बैठता है। राज्य शिक्षा बोर्ड का मुख्यालय भी कांगड़ा जिले के धर्मशाला में हैं। सूत्रों के अनुसार इस मामले में शिक्षा बोर्ड के अधिकारी भी लपेटे में आ रहे हैं। बिना लिखित परीक्षा दिए नौकरी पर रखा एक अभ्यर्थी

क्लर्को व असिस्टेंट मैनेजर की भर्ती परीक्षा बोर्ड के माध्यम से करवाई गई थी। इनमें व्यापक धांधलियां बरतने के आरोप लगे थे। आरोपों की जांच के लिए राज्य सरकार ने विजिलेंस जांच करवाई। जांच के अनुसार एक अभ्यर्थी ऐसा भर्ती हुआ जिसने लिखित परीक्षा नहीं दी थी। इसके बावजूद उसे नौकरी मिल गई। इसकी शिकायत हुई तो शिकायतकर्ता को भी बैंक प्रबंधन ने नौकरी दे दी। लेकिन एक बार जो अपराध हो गया, उसके आधार पर विजिलेंस कानूनी कार्रवाई करेगी। पुलिस अधिकारी की बेटी को भी प्रबंधन ने नौकरी पर रखा। उसके कंप्यूटर डिग्री के अंक मूल योग्यता में जोड़े गए। ये अंक न जोड़ते तो वह भर्ती के लिए पात्रता भी पूरी नहीं करती। इस रसूखदार से भी विजिलेंस पूछताछ कर सकती है।

एनपीए मामले की होगी जांच

पूर्व कांग्रेस सरकार के पांच साल के कार्यकाल में बैंक की नॉन परफॉर्मिग असेट (एनपीए) बढ़कर 720 करोड़ रुपये हो गई। यह राशि बैंक की कुल जमा पूंजी की 21 फीसद है। नियमों के तहत किसी भी बैंक का एनपीए 10 फीसद से अधिक नहीं होना चाहिए। आरोप है कि बैंक प्रबंधन ने ऋण देने के अधिकांश मामलों में नियमों की अवहेलना की। यह सब पांच साल के दौरान हुआ जबकि इससे पहले बैंक की एनपीए 10 फीसद से कम थी। इसके अलावा 303 करोड़ का ऋण नाबार्ड के नियमों के खिलाफ दिया गया। अब एनपीए मामले की भी जांच होगी।

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