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पौंग जलाशय से 2800 मछुआरों को मिला रोजगार,जयराम सरकार इसकी अलावा भी कर रही है ये अच्छा कार्य जिससे मिल रहा है कई परिवारों को लाभ

प्रदेश की जयराम सरकार प्रदेश के विकास के साथ-साथ कई अच्छी योजनाओं को धरातल पर उतार कर प्रदेश वासियों की काफी मदद कर रही है। आज प्रदेश सरकार की कई योजनाओं का लाभ प्रदेश की जनता ले रही है। प्रदेश सरकार कांगड़ा जिला की शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बने पौंग बांध जलाशय के माध्यम से लगभग 2800 मछुआरों को रोजगार उपलब्ध करवा रही है।

आपकी जानकारी के लिए हम बता दें कि वर्तमान में मछुआरों की 15 सहकारी समितियां कार्यरत हैं जिन्होंनें लगभग 3,902 मछुआरों को सदस्यता प्रदान की है और 2800 लाईसेंस धारक मछुआरे जलाशयों में कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में मत्स्य पालन के व्यवसाय से जुड़े 2800 सक्रिय मछुआरे विस्थापित परिवारों से सम्बन्ध रखते हैं। इसके अतिरिक्त 2800 मछुआरों को प्रत्यक्ष रोजगार के अलावा मछली पकड़ने की गतिविधियां, उनकी सहायता करने, ढुलाई, परिवहन, मछली की पैकिंग, बुनाई और उनके विपणन आदि के लिए एक हजार से अधिक परिवारों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान किया गया है।

आपको हम बता दें कि कोलबांध, गोबिन्दसागर, चमेरा, रणजीतसागर तथा पौंगबांध परियोजनाओं के पूरा होने से मछली पकड़ने की गतिविधियों के लिए मुख्यतः 6 हजार से अधिक मछुआरों के परिवारों को पूर्णकालिक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान किया जा रहा है। गरीब मछुआरों के हितों की रक्षा के लिए प्रदेश सरकार का मत्स्य पालन विभाग मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए हर सम्भव प्रयास कर रहा है।

प्रत्येक वर्ष की शुरूआत में ही गर्मियों के दौरान खुली नीलामी के माध्यम से दरें तय की जाती हैं जो पहली अप्रैल से 30 सितम्बर और सर्दियों में पहली अक्तूबर से 31 मार्च तक मान्य होती हैं। विभाग मछली की कुल बिक्री आय में 15 प्रतिशत राॅयल्टी लेता है जबकि सहकारी समितियां 5 से 7 प्रतिशत कटौती के बाद नियमित रूप से 10 मछुआरों को प्र्रति सप्ताह भुगतान करती है। इसी प्रकार मछुआरों को उनके मछली पकड़ने की लागत का 78 से 80 प्रतिशत दिया जाता है।

मत्स्य पालन विभाग ने अन्य मछुआरों के लिए गहरे पानी में गीयर्स के संचालन के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू किया है जिसमें विभिन्न समुदायों के मछुआरों को मछली पकड़ने के व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है।पौंग जलाशय में ज्यादातर मछुआरे पूर्णकालिक मछुआरे हैं और औसतन हर मछुआरे के पास लगभग 60 हजार रूपये मूल्य की एक नाव है। मछुआरे आम तौर पर जाल का उपयोग करते हैं। आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों के लिए न्यूनतम स्वीकार्य आकार विभाग द्वारा ही तय किया जाता है।

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