राजनीती

भीलवाड़ा मॉडल ग्राउंड रिपोर्ट: कोरोना(Corona) से लड़ा महायुद्ध, जिसकी देशभर में चर्चा, वुहान बनने से ऐसे रोका

देश में सबसे पहले कोरोना जोन बने भीलवाड़ा ने वायरस के खिलाफ महायुद्ध जीत लिया है। यह देश का एकमात्र शहर है, जिसने 20 दिन में कोरोना को हरा दिया। यह यूं ही संभव नहीं हुआ। जिला प्रशासन की ठोस रणनीति, कड़े फैसले, चुनाव की तरह मैनेजमेंट और जीतने की जिद।कलेक्ट्रेट के कर्मचारियों ने रात-रात भर जागकर काम किया और भीलवाड़ा को बेमिसाल बना दिया। यहां हालात इस कदर बिगड़े कि राजस्थान में सर्वाधिक 27 मरीज आ गए। ये सभी एक निजी अस्पताल के स्टाफ व मरीज थे। बढ़ती संख्या से घबराए प्रशासन ने खुद कहा था, ‘भीलवाड़ा बारूद (कोरोना) के ढेर पर है।’ लेकिन हौसला बरकरार रहा।

क्‍या है ‘भीलवाड़ा मॉडल’?

राजस्थान के भीलवाड़ा में कोरोना वायरस से निपटने को लेकर अपनाई गई नीति पूरे देश में लागू हो सकती है। भीलवाड़ा में एक डॉक्टर के संक्रमित होने के बाद वहां तेजी से कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या बढ़ी, लेकिन बाद में यह आंकड़ा 27 मरीजों से अधिक नहीं बढ़ा। पॉजिटिव मरीज सामने आते ही भीलवाड़ा में कर्फ्यू लगाकर सीमाएं सील कर दी गईं। जिले के सभी निजी अस्पतालों और होटलों को अधिगृहीत कर लिया गया। लॉकडाउन कि सख्ती से पालना और घर-घर स्क्रीनिंग की गई। जनप्रतिनिधियों,मीडिया और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को भी शहर में प्रवेश नहीं दिया गया। जिला प्रशासन और पुलिस के भी कुछ ही अधिकारी शहर में गए।

लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करवाने पर जोर दिया गया। इन सबके चलते भीलवाड़ा में कोरोना के मामले आगे नहीं बढ़े। डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ ने अपना मनोबल ऊंचा रखा। इसका असर भी दिखा और कई संक्रमित मरीज ठीक हो गए। भीलवाड़ा में प्रशासनिक, पुलिस और मेडिकल के थ्री टियर प्रयास के साथ साथ वहां की जनता ने भी सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा। इसकी बदौलत कोरोना पर काफी हद तक नियंत्रण कर लिया गया है। भीलवाड़ा में पिछले 17 दिन से कर्फ्यू लगा हुआ है। पिछले तीन दिन से शहर में महा कर्फ्यू लगा हुआ है, यहां तीन हजार पुलिस के जवान और एक दर्जन वरिष्ठ अधिकारी तैनात किए गए हैं।

19 मार्च को पहला मरीज आया। अगले दिन पांच और मरीज आते ही जिला कलेक्टर राजेंद्र भट्ट ने कर्फ्यू लगा दिया। रोज कई मीटिंगें, अफसरों से फीडबैक और प्लानिंग। सरकार को रिपोर्टिंग। देर रात सोना। जल्दी उठकर फिर वही रूटीन। 3 अप्रैल को 10 दिन का महाकर्फ्यू। यही कड़ा फैसला महायुद्ध में मील का पत्थर साबित हुआ।

आखिरकार जिद की जीत हुई। जिस शहर को पहले देश का वुहान (चीनी शहर) और इटली की संज्ञा दी जाने लगी। वहां गंभीर रोगियों की मौत को छोड़ दें तो डॉक्टरों की कड़ी मेहनत ने कोरोना को मात दे दी। तीन डॉक्टर सहित 21 संक्रमित ठीक कर दिए। अब 4 मरीज हैं। यही वजह है कि भीलवाड़ा को केंद्र सरकार से भी तारीफ मिली। क्लस्टर कंटेनमेंट का यह मॉडल देशभर में लागू हो रहा है, अब कोरोना से लड़ने का तरीका पूरा देश भीलवाड़ा से सीखेगा।

दो बार सेनेटाइजेशन
शहर के 55 वार्डों में नगर परिषद के जरिये दो बार सैनिटाइजेशन करवाया। हर गली-मोहल्ले, कॉलोनी में हाइपोक्लोराइड एक प्रतिशत का छिडकाव किया गया।

संक्रमण फैलाने वाला अस्पताल सील
सबसे पहले प्रशासन ने संक्रमित स्टाफ वाले अस्पताल को सील करवाया। 22 फरवरी से 19 मार्च तक आए मरीजों की सूची निकलवाई। 4 राज्यों के 36 व राजस्थान के 15 जिलों के 498 मरीज आए। इन सभी के कलेक्टर को सूचना देकर उन्हें आइसोलेट कराया। अस्पताल के 253 स्टाफ व जिले के 7 हजार मरीजों की स्क्रीनिंग की।

पहली बार 25 लाख की स्क्रीनिंग
भीलवाड़ा जिले में देश की सबसे बड़ी 25 लाख लोगों की स्क्रीनिंग कराई गई। छह हजार कर्मचारी जुटे। मरीजों के संपर्क में आए लोगों की पहचान की। 7 हजार से अधिक संदिग्ध होम क्वारंटीन में रखे। एक हजार को 24 होटलों, रिसोर्ट व धर्मशालाओं में क्वारंटीन किया।

रात 3 बजे तक डाटा कलेक्शन
सर्वे की जिम्मेदारी चिकित्सा विभाग की थी। गांवों में फील्ड सर्वे की जिम्मेदारी एडीएम राकेश कुमार को दी गई। यह बड़ी चुनौती थी। कोर टीम रात तीन बजे तक संबंधित एसडीएम से डाटा कलेक्शन कर कंपाइल करती। अगले दिन सुबह होते ही कलेक्टर की टेबल पर रिपोर्ट होती। इसी आधार पर तय होती थी अगली रणनीति।

आइसोलेशन वार्ड बदलते रहे स्टाफ
जिले के राजकीय अस्पताल में कोरोना मरीजों के लिए बनाया आइसोलेशन वार्ड। इसमें कार्यरत डॉक्टर्स व मेडिकल स्टाफ की हर सप्ताह ड्यूटी बदली। वे कोरोना से संक्रमित न हों, इसलिए सात दिन की ड्यूटी के बाद उन्हें भी 14 दिन क्वारंटीन में रखा। नतीजा, अब तक 69 स्टाफ में से एक भी संक्रमित नहीं हुआ।

सफलता की कहानी: पहले कर्फ्यू फिर महाकर्फ्यू...
छह पॉजीटिव केस आते ही 20 मार्च को भीलवाड़ा शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। फिर 14 दिन बाद 3 से 13 अप्रैल तक दस दिन के लिए महाकर्फ्यू। ऐसा करना जरूरी था, ताकि लोग घरों में ही रहें। वायरस का सामुदायिक प्रसार न हो।

जहां कोरोना मरीज, वहां कर्फ्यू
जिले के ग्रामीण क्षेत्र या गांव का व्यक्ति कोरोना से संक्रमित मिला, उस गांव या क्षेत्र को सेंटर प्वाइंट मानते हुए एक किमी की परिधि को नो मूवमेंट जोन घोषित कर दिया यानि वहां कर्फ्यू भी लगाया।

जिले की सीमाएं सील…
प्रशासन ने जिले की सीमाएं सील कर दीं। 20 चेक पोस्ट बनाकर कर्मचारी तैनात कर दिए, ताकि न कोई बाहर से आ सके, न जिले से बाहर जा सके।

सभी बसें और ट्रेन बंद कराईं
शहर व जिले में रोडवेज व प्राइवेट बसें सहित सभी तरह के वाहन व ट्रेन भी बंद करवाए। संक्रमित आ-जा न सके।

राशन वितरण
कर्फ्यू में लोगों को खाने-पीने का सामान भी मिलता रहे। इसके लिए सहकारी भंडार के जरिये वाहनों से घर-घर राशन सामग्री, फल-सब्जियां व डेयरी के जरिये दूध पहुंचाया गया। श्रमिकों, असहाय व जरूरतमंदों को निशुल्क भोजन पैकेट व किराना सामान भेजा।

जन सहयोग से हुआ संभव
भीलवाड़ा में हमने पहले चरण में कोरोना से महायुद्ध जीत लिया है। अब तक 21 मरीज निगेटिव से पॉजिटिव हो गए। इनमें से 15 को घर भेज दिया गया। केंद्र सरकार ने हमारे लिए निर्णयों व रणनीति को मॉडल माना है। यह सब पूरी टीम के सहयोग से ही संभव हुआ। भीलवाड़ा की जनता का भी पूरा सहयोग मिला। अब महायुद्ध का दूसरा चरण है। इसे भी हम सब लोगों के सहयोग से जीतेंगे, ऐसा मुझे विश्वास है। -राजेंद्र भट्ट, जिला कलेक्टर

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