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Breaking News – गुस्से में योगी आदित्यनाथ उद्धव ठाकरे को किया फोन,संतों के हथियारों के खिलाफ सख्त करवाई करने को कहा

महाराष्ट्र के पालघर में जूना अखाड़ा के संतों की हत्या के संबंध में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महाराष्ट्र सीएम उद्धव ठाकरे से फोन पर बात की। उन्होंने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी है।

मुख्यमंत्री योगी ने ट्वीट किया कि पालघर में हुई जूना अखाड़ा के संतों स्वामी कल्पवृक्ष गिरि जी, स्वामी सुशील गिरि जी व उनके ड्राइवर नीलेश तेलगड़े जी की हत्या के संबंध में रविवार शाम महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से बात की और घटना के जिम्मेदार तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का आग्रह किया।

पालघर में जूना अखाड़े के संतों की मॉब लिंचिंग, उद्धव की पुलिस मूकदर्शक: अखाड़ा परिषद की कठोर कार्रवाई की माँग

महाराष्ट्र के पालघर के दहाणु तालुका के एक आदिवासी बहुल गडचिनचले गाँव में सैकड़ों लोगों की भीड़ द्वारा जूना अखाड़ें के दो संतों और उनके ड्राइवर की पुलिस के सामने ही बड़ी बेरहमी से पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। घटना गुरुवार (अप्रैल 16, 2020) के देर रात की है। घटना की जानकारी होते ही संत समाज में गहरा आक्रोश व्याप्त है कि कैसे महाराष्ट्र पुलिस के सामने दो महात्माओं और उनके ड्राइवर की इस तरह से हत्या कर दी जाती है और पुलिस मूक दर्शक बनी रहती है।

क्या है पूरा मामला

जूना अखाड़ा के 2 महंत कल्पवृक्ष गिरी महाराज (70 वर्ष), महंत सुशील गिरी महाराज (35 वर्ष) अपने ड्राइवर निलेश तेलगडे (30 वर्ष) के साथ मुंबई से गुजरात अपने गुरु भाई को समाधि देने के लिए जा रहे थे। दरअसल, श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा 13 मंडी मिर्जापुर परिवार के एक महंत राम गिरी जी गुजरात के वेरावल सोमनाथ के पास ब्रह्मलीन हो गए थे। दोनों संत महाराष्ट्र के कांदिवली ईस्ट के रहने वाले थे और मुंबई से गुजरात अपने गुरु की अंत्‍येष्टि में शामिल होने जा रहे थे।

गुरु के देहावसान के बाद अचानक से मिर्जापुर परिवार के कुछ सन्तों को वहाँ बुलाया गया था ताकि महात्मा जी की समाधि लगाई जा सके। जिनमें से उसी परंपरा के दो संत महंत कल्पवृक्ष गिरी जी महाराज और दूसरे महंत सुशील गिरी जी महाराष्ट्र से गुजरात के वेरावल के लिए रवाना हुए रास्ते में उन्हें महाराष्ट के पालघर जिले में स्थित दहाणु तहसील के गडचिनचले गाँव में पालघर थाने के पुलिसकर्मियों ने पुलिस चौकी के पास रोका।

ड्राइवर के साथ दोनों संतों को भी गाड़ी से बाहर निकलने के लिए कहा गया और उन लोगों को पुलिस वालों ने, सड़क के बीच में ही बैठा दिया, कहा जा रहा है वहाँ गाँव के करीब 200 के आस पास लोग अचानक ही इकट्ठे हो गए।

यह भी कहा जा रहा है कि जूना अखाड़े के उन दोनों सन्तों और ड्राइवर को, पुलिस वालों ने डर के कारण एक तरह से उन लोगों के हवाले कर दिया और इस भीड़ ने, पुलिस वालों के सामने ही डंडे और पत्थरों से मार-मार कर दोनों सन्तों और ड्राइवर की बेरहमी से हत्या कर दी। अभी तक जो वीडियो फुटेज उपलब्ध हैं उसमें आप पुलिस वालों की मौजूदगी देख सकते हैं। मॉब लिंचिंग होता देख पुलिस खुद ही चिहुँक रही है। ऐसे में महाराष्ट्र पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है।

पुलिस और ग्रामीणों की भूमिका संदिग्ध

जैसा कि आप वीडियो में भी देख सकते हैं कि जब भीड़ द्वारा उन्हें बेरहमी से पीटा जा रहा है तो न सिर्फ पुलिस वहाँ मौजूद है बल्कि एक वीडियो में तो खुद ही पुलिस संत कल्पवृक्ष गिरी महराज को पुलिस चौकी से बाहर लाते और फिर भीड़ के सामने यूँ ही असहाय हालत में छोड़ती नजर आ रही है। भीड़ को पीटते देख भी पुलिस की कोई कार्रवाई नजर नहीं आ रही है। अलबत्ता पुलिस वाला खुद ही बचता नजर आ रहा है। नहीं तो पुलिस की मौजूदगी में कम से कम संतों की इस तरह से बर्बर हत्या नहीं हुई होती।

दूसरा बच्चा चोर का आरोप भी मीडिया के एक धड़े द्वारा फैलाया नजर आ रहा है। रात के अँधेरे में लॉकडाउन के समय वहाँ सड़क पर इतनी बड़ी भीड़ अचानक इकट्ठी नहीं हो सकती थी। अगर इकट्ठी हुई भी तो पुलिस ने जिन्हें पूछताछ के लिए रोका और वो बाकायदा अपना परिचय बता रहे हैं तो पुलिस ने भीड़ को न रोककर चौकी से निकालकर संत को भीड़ के बीच क्यों ले गई?

लॉकडाउन में संतों को क्यों जाना पड़ा

नागा सम्प्रदाय में जब कोई कोई संत-महात्मा का देहावसान होता है तो उनको समाधी सिर्फ उनके परम शिष्य देते आए हैं। नागा समाज में गुरु शिष्य सम्बन्ध बहुत करुणामय और प्रगाढ़ होता है। ये सब आपस में ममता के बंधन से जुड़े होते हैंl किसी का अहित नहीं सोचने वाले ये साधू जीवन भर साधना के साथ गरीब, दलित और पिछड़े लोगों की सेवा में रत रहते हैंl ये सन्यासी अपना सर्वस्व त्याग कर जाति और वर्ण के बंधनों से मुक्त होकर निराकार की आराधना करते हैं। इसलिए ये निर्लिप्त, अघोर, निरपेक्ष होते है और अपने इसी परंपरा का निर्वाह करने के लिए अपने पूजनीय गुरू के देहावसान की खबर सुनकर ये साधू अपने गुरु को समाधी देने किसी तरह गुजरात जा रहे थे। इस दौरान गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा पर पालघर जिले के गडचिनचले गाँव से गुजरते हुए देर रात ये घटना घटी।

संत समाज के इन महात्माओं की गलती बस इतनी थी कि इन्होनें सोचा लॉकडाउन है तो जाना मुश्किल होगा और क्या पता पुलिस हमें जाने दे या न जाने दे हमारे गुरु की समाधि लगाने के लिए इसलिए भावनाओं और कर्तव्य पालन के वशीभूत हो बॉर्डर वाले गाँव के अंदर से जो रास्ता था, उसी रास्ते से जाने की सलाह बनाई गई मालूम पड़ती है लेकिन उनको क्या पता कि अंदर क्या होने वाला है और ये बड़ी और वीभत्स घटना सामने आई।

नागा साधू, इनका इतिहास और फेक मीडिया नैरेटिव

आज जिस जूना अखाड़े के संतों की हत्या पर मीडिया गिरोह लीपापोती पर उतारू है और उसे बच्चा चोरी जैसे नैरेटिव की आड़ में मॉबलिंचिंग को एक सामान्य घटना बनाकर पेश करते हुए उन हत्यारों का बचाव कर रही है और कइयों को अभी तक ये पता भी नहीं चला है कि किन तीन लोगों की हत्या हुई? वे कौन थे? बल्कि उसे और हलका करने के लिए यह लिखा जा रहा है कि आक्रोशित भीड़ ने बच्चा चोर समझ कर तीन लोगों को पीट दिया जिससे बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इस नैरेटिव की आड़ में आज घटना घटे दो दिन होने के बाद भी हर छोटी बात पर बवाल काटने वाली वामपंथी लिबरल गैंग मौन है।

अपने गुरु भाई की समाधी के लिए भावुक होकर निकले जूना अखाड़ा के इन संतो ने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा होगा कि कुम्भ के महीने में जब ये करोड़ों लोगों को बिना किसी भेदभाव के एक ही संगत में बैठा कर भोजन कराते हैं। उन साधुओं की हत्या उस इलाके में कर दी जाएगी जिस नासिक महाराष्ट्र के क्षेत्र में नागा साधुओं की संख्या बहुत ज़्यादा है और लोग उनसे परिचित भी हैं। इन नागा साधुओं ने अंग्रेजों और मुगलों के खिलाफ भी बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी है l दशकों तक चलने वाले सन्यासी विद्रोह का भी इन्हीं नागा सन्यासियों ने नेतृत्व किया था l यहाँ तक कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की रूप रेखा भी इन्हीं नागा साधुओं के अखाड़े में बनी थी l

आज अचानक देश का यह हिस्सा जहाँ बहुतायत में नागा सन्यासी हैं। इन साधुओं के प्रति इतना असंवेदनशील हो गया हैl कि भेषभूसा, बातचीत, पूछताछ के बाद भी कोई उनके बारें में अफवाह फैला रहा है तो महाराष्ट्र पुलिस सच जानने के बाद भी उन्हें भीड़ के हवाले कर दे रही है और भीड़ 70 वर्षीय वृद्ध और संत के रूप में देखकर भी जूना अखाड़े के कल्पवृक्ष गिरी, उनके गुरु भाई और ड्राइवर को पीटकर मार डालती है। और फेक नैरेटिव गढ़ने वाले लोग हत्यारों और सरकार का बचाव करने लगते हैं क्योंकि वहाँ शासन में कॉन्ग्रेस हिस्सेदार है और शिवसेना अपने लिबरल भूमिका में है।

जानकारी के लिए बता दूँ कि मीडिया की गढ़ी थ्योरी और पुलिस की भूमिका दोनों इसलिए संदिग्ध मानी जा रही है क्योंकि ठीक इसी तरह 2008 में कंधमाल में माओवादियों ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती सहित तीन और साधुओं की हत्या गोली मार कर दी थी। लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या इसलिए हुई थी क्योंकि स्वामी जी कंधमाल में निर्दोष आदिवासियों के धर्म परिवर्तन का विरोध कर रहे थेl आज यह हत्या उसी घटना की याद दिलाती है। और कहीं न कहीं इसकी आड़ में भी किसी साजिश या हत्यारों को बचाने की बू आ रही है।

संतों द्वारा अभी के हत्या के तरीकों और उस क्षेत्र में मुस्लिम और नक्सल गतिविधियों को देखते हुए सिर्फ चोरी की अफवाह को कारण मानने को तैयार नहीं है। कहा यह भी जा रहा है कि पिछले दिनों में गुजरात महाराष्ट्र के सीमा पर स्थित इन जिलों में माओवादी गतिविधि में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। और माओवादी नक्सली भी लूटपाट के इरादे से गलती से उधर आई किसी गाड़ी को रोककर, हत्या की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। इस घटना के ठीक तीन दिन पहले भी उस इलाके में ऐसी ही एक घटना की खबर है। लेकिन लॉकडाउन की वजहों से या हमलावरों को बचाने के उद्देश्य से वह भी मीडिया में रिपोर्ट नहीं हुई। उस घटना का जिक्र हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में बहुत ही संक्षेप में है।

इसके अलावा दो-तीन दिन पहले कई दूसरे जगहों से भी ये रिपोर्ट आई थी कि लॉकडाउन के कारण भोजन आदि जुटाने के लिए नक्सली ग्रामीणों को के साथ इक्का-दुक्का राहगीरों को परेशान और लूटपाट कर रहे हैं।

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ने की निंदा और उठाई कठोर कार्रवाई की माँग

ऑपइंडिया ने सभी 13 अखाड़ों के परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी से बात की तो उन्होंने साफ़ शब्दों में इसका घटना में शामिल संभावितों की तरफ इशारा किया और कहा, “महाराष्ट्र में कोरोना के नाम पर धर्म विशेष के लोगों द्वारा जूना अखाड़े के दो संतों की हत्या किए जाने की अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद कड़े शब्दों में निंदा करता है।”

पालघर में साधुओं की हत्या और मीडिया: ‘3 लोगों’ की मॉब लिंचिंग, ‘चोर’ का भ्रम – हेडलाइन से पाठकों को यूँ बरगलाया

भारतीय मीडिया का दोहरा स्वरूप इन दिनों अपनी चरम पर है। मीडिया चैनलों से लेकर अखबारों तक हर जगह ये केवल अपने पाठकों/दर्शकों को बरगलाने का काम कर रहा है। बीते दिनों द टेलीग्राफ और इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों की ओछी हरकतें हमने देखी ही कि आखिर किस तरह एक तबलीगी जमात के किए धरे का ठीकरा उन्होंने आरएसएस के मत्थे फोड़ दिया। अपने इसी रवैये पर आगे बढ़ते हुए इन मीडिया हाउस ने महाराष्ट्र के पालघर में हुई साधुओं की हत्या पर जो रिपोर्टिंग की, वो न केवल निंदनीय है, बल्कि शर्मसार करने वाली भी है।

एक ऐसी घटना जहाँ स्पष्ट तौर पर भीड़ ने साधुओं की मॉब लिंचिंग की और उन्हें क्रूरता से मार दिया, उस घटना को हमारे ‘निष्पक्ष मीडिया’ ने किस प्रकार अपने पाठकों को पेश किया, इसे प्रमाण सहित देखिए।

महाराष्ट्र के पालघर में 16 अप्रैल को हुई घटना निस्संदेह ही झकझोरने वाली थी। लेकिन इसको लेकर सोशल मीडिया पर आक्रोश कल यानी 19 अप्रैल को देखने को मिला। इस बीच ऐसा नहीं था कि हम तक मीडिया ने ये खबर नहीं पहुँचाई। लेकिन जिस प्रकार उन्होंने इसे संप्रेषित करने का तरीका चुना, उसने पाठकों को कुछ देर के लिए ही सही, इस पर प्रतिक्रिया देने से रोके रखा।

वामपंथी मीडिया संस्थानों ने 17 अप्रैल को इस खबर को कवर तो किया लेकिन उस तरह नहीं जैसे वो अन्य मामलों पर अपनी रिपोर्टिंग करते हैं। उदाहरण देखिए। जिस इंडियन एक्प्रेस ने अभी हाल में आरएसएस को बदनाम करने के लिए अपनी एक खबर में हिंदू दंपत्ति की तस्वीर लगाई, उसी ने घटना पर केवल ये लिखा कि पालघर में चोरी के संदेह में 3 लोगों की मॉब लिंचिग कर दी गई।

द हिंदू ने भी अपनी रिपोर्ट के शीर्षक में किसी जगह पर साधू शब्द का इस्तेमाल करना उचित नहीं समझा। इन्होंने भी 3 लोगों की लिंचिंग को ही अपनी खबर में प्राथमिकता दी।

इसी प्रकार टाइम्स ऑफ इंडिया की भी खबर इसी एंगल पर चली। इसके बाद हिंदुस्तान टाइम्स ने भी 200 लोगों की भीड़ का उल्लेख कर पूरी घटना की भर्त्सना को जरा सा दर्शाया लेकिन मुख्य बात यानी साधुओं की हत्या की बात उनके शीर्षक से भी नदारद रही।

यहाँ हैरानी की बात है कि ये वही मीडिया है, जो मुस्लिम के पीड़ित होने पर या तो अपनी हेडलाइन में मुस्लिम शब्द का प्रयोग विशेषत: करता है या फिर उस भीड़ को हिंदुओं की भीड़ जरूर बताता है, जो मॉब लिंचिंग की आरोपित होती है।

इस बात को समझने के लिए बहुत दूर उदाहरणों को देखने मत जाइए। पिछले साल हुए तबरेज की खबरों को खँगाल कर पढ़ लीजिए, समझ आ जाएगा कि भारतीय मीडिया धर्म/मजहब के बीच फर्क करते-करते किस गर्त में जा गिरा है कि इनके लिए मुस्लिम युवक यदि आरोपित हो तो वो शीर्षक के लायक नहीं है, मगर यदि वो पीड़ित हो तो उसकी पूरी कुंडली वे कोशिश करते हैं कि हेडलाइन में ही पेश कर दें।

भारतीय मीडिया का ये रवैया हाल में इतना नहीं बदला है। इसने एक लंबे समय तक इसी प्रकार कभी भ्रामक तस्वीर तो कभी भ्रामक शीर्षक के जरिए लोगों को बरगलाया है। साल 2018 में भी एक खबर आई थी। जहाँ एक मुस्लिम रेप का आरोपित था। मगर, रेप जैसी घटनाओं में मौलवियों या मुस्लिमों की संलिप्ता देखकर इसी मीडिया ने अपनी फीचर इमेज में साधुओं की प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई थी और दीन मोहम्मद व आसिफ नूरी के दोषी होने पर उनके लिए अपने शीर्षक में ‘गॉडमैन’ शब्द का प्रयोग किया था।

अफसोस! आज जब वास्तविकता में रिपोर्ट में साधू शब्द और उससे जुड़ी प्रतीकात्मक तस्वीरों की जरूरत पड़ी तो इन्ही संस्थानों की आर्काइव गैलरी और शब्दावली में भारी कमी आ गई। इन्होंने साधुओं की हत्या को मात्र 3 लोगों की लिंचिंग बताया, वो भी यह कहकर कि उन पर चोरी करने का संदेह था।

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